पाक-चीन द्वारा भारत विरोध पर सहमति के दृष्टिगत हमारी नीतियों पर पुनर्विचार जरूरी

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नए रिश्ते बनाने तथा पुराने रिश्तों को मजबूत करने के परिप्रेक्ष्य में आगामी दिनों में भारत विभिन्न एशियाई देशों के साथ अपने संपर्कों को मजबूत करने की योजना बना रहा है। अगले कुछ सप्ताहों में वियतनाम के विदेश मंत्री फाम-बिन्ह-मिन्ह और उपराष्ट्रपति भारत आने वाले हैं, उनके जल्दी ही बाद मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रज्जाक का भारत आने का कार्यक्रम है तथा वर्ष के उत्तराद्र्ध में भारत संभवत: आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मालकम टर्नबुल की मेजबानी करेगा। बंगलादेश की प्रधानमंत्री के भी एक महीने तक भारत आने की संभावना है।

हालांकि श्रीलंका की भांति ही मलेशिया और इंडोनेशिया भी चीन से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहे हैं और चीन वहां अनेक बड़ी परियोजनाएं चला रहा है परन्तु चूंकि अमरीका के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं और भारत की सहायता से इनके लिए अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने तथा दोस्ती बढ़ाने के ही नहीं बल्कि व्यापार बढ़ाने के भी अधिक मौके हैं, ये देश भारत को साथ लेकर, एक शक्ति संतुलन कायम करना चाहते हैं। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या भारत की एक सुपरिभाषित नीति है, जिसके अन्तर्गत भारत के हित सर्वोपरि महत्वपूर्ण हों? ऐसी नीति जो कम आदर्शवादी और अधिक व्यावहारिक हो।

22 फरवरी को चीन के विदेश मंत्री झांग येसुई के साथ चीन-भारत रणनीतिक संवाद की संयुक्त रूप से अध्यक्षता करने के लिए भारत के विदेश सचिव श्री एस. जयशंकर बीजिंग में थे। जयशंकर के चीन रवाना होने से पहले ही संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना और पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के अमरीका के प्रस्ताव को चीन रद्द कर चुका था। इससे पहले भी 2016 में चीन 3 बार इस संबंध में भारतीय प्रस्ताव को रद्द कर चुका है। इसलिए इस मुद्दे को उसी मंच पर उठाने से शायद ही इसमें कुछ प्रगति हो सकती थी लेकिन वह हुई भी नहीं। इसी प्रकार न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एन.एस.जी.) में भारत के प्रवेश के चीन द्वारा विरोध के दूसरे विवादास्पद मुद्दे पर लुओ झुआई ने कहा कि चीन का स्टैंड इस संबंध में पहले वाला ही है। (अर्थात चीन इसका विरोध करता है)।

हालांकि चीनी नेताओं को यह बात भली-भांति मालूम है कि भारत का न सिर्फ अफगानिस्तान में आर्थिक रूप से बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ है, बल्कि वहां पाक समर्थित आतंकवाद बढऩे को लेकर भी यह ङ्क्षचतित है, जो भारत को सर्वाधिक प्रभावित करता है परन्तु चीन ने भारत को अफगानिस्तान के मुद्दे से अलग रखने की यह कहते हुए कोशिश की है कि अफगानिस्तान के संबंध में रूस, पाकिस्तान और चीन चिंतित हैं तथा वहां शांति की बहाली के लिए संयुक्त रूप से प्रयास कर रहे हैं।

संभवत: इन्हीं मुद्दों पर जवाब वांछित था परन्तु भारतीय विदेश सचिव द्वारा स्वदेश वापसी पर की गई वह टिप्पणी इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि अभी भी हमारी चीन संबंधी नीति सुविचारित नहीं है। अपनी इस टिप्पणी में एस. जयशंकर ने कहा था कि ‘‘चीन ने भारत को पाकिस्तान के साथ बनाए जाने वाले नए सिल्क रूट में भागीदार बनने की पेशकश की है और भारत इस पर विचार कर रहा है।’’ और भारत एक व्यापार रूट का हिस्सा बनने पर कैसे विचार कर सकता है, जो भारत द्वारा अभी भी अपना समझे जाने वाले तथा अपने नक्शों में दिखाए जाने वाले पाक अधिकृत कश्मीर के विवादास्पद क्षेत्र पर निर्मित किया जा रहा है।

शायद भारत को इस संबंध में छोटे से देश उज्बेकिस्तान से सीखने की जरूरत है, जिसने चीन-अफगान स्पैशल ट्रांसपोर्टेशन रेलवे के अन्तर्गत प्रथम मालवाहक रेलगाड़ी को अपने क्षेत्र से गुजर कर कजाकिस्तान और चीन जाने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया। इस संबंध में उज्बेकिस्तान का तर्क स्पष्ट था कि चीनी बिजली के सामान, दूसरी चीजों, कपड़ों आदि की ढुलाई करने वाली ये गाडिय़ां पाकिस्तान से आतंकवादी और अफगानिस्तान से अफीम भेजने का माध्यम बन जाएंगी क्योंकि अफीम का एक-चौथाई व्यापार अफगानिस्तान से ही होता है।

संभवत: भारत सरकार को पाकिस्तान के दोस्तों या पाकिस्तान के दुश्मनों के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर अपनी कूटनीतिक गतिविधियां आगे बढ़ाने की जरूरत है कि उसके अपने लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। भारत को मालूम है कि पाकिस्तान और चीन में भारत विरोध को लेकर बड़ी गहरी सहमति है। इस हालत में भारत के लिए इस क्षेत्र की अगली बड़ी शक्ति के रूप में स्वयं को देखते हुए अपनी नीतियों पर पुनर्विचार और सुविचार करना आवश्यक है।

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