जाने शीतलाष्टमी व्रत के बारे में…

About the cold winter festival ...

यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस व्रत के करने से व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक ज्वर, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, चेचक नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुन्सियों चिह्न, तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से शीतलादेवी प्रसन्न होती हैं। इस वर्ष बुधवार 27 मार्च को अष्टमी रात 12 बजकर 16 मिनट से लग जा रही है जो गुरुवार 28 मार्च को रात 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। अतः गुरुवार 28 मार्च को ही शीतलाष्टमी मनायी जाएगी। 

इस दिन प्रातःकाल शीतल जल से स्नान कर

” मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रवप्रशमनपूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमीव्रतमहं करिष्ये।”

ऐसा संकल्प करें। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिये जाते हैं अर्थात् शीतला माता को एक दिन का बासी( शीतल) भोग लगाया जाता है। इसलिए लोक में यह व्रत बसौड़ा के नाम से भी प्रसिद्ध है। भोग के लिए मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल, भात, लपसी, आदि एक दिन पहले से ही बनाये जातेे हैं, जिस दिन व्रत रहता है, उस दिन चूल्हा नही जलाया जाता।
इस व्रत में रसोईघर की दीवार पर पाँचो अँगुली घी में डुबोकर छापा लगाया जाता है। उसपर रोली, चावल चढ़ाकर शीतलामाता के गीत गाये जाते हैं।
सुगन्धित गन्ध-पुष्पादि से शीतला माता का पूजन-कर ‘शीतलास्त्रोत’ का यथासम्भव पाठ करना चाहिए तथा शीतला माता की कहानी भी सुननी चाहिए। रात्रि में दीपक जलाने चाहिए। एक थाली में भात, रोटी, दही, चीनी, जल का गिलास, रोली, चावल, मूँग की दाल का छिलका, हल्दी, धूपबत्ती, तथा मोंठ, बाजरा, आदि रखकर, घर के सभी सदस्यों को स्पर्श कराकर शीतलामाता के मन्दिर में चढ़ाना चाहिए। इस दिन चौराहे पर भी जल चढ़ाकर पूजन करने का विधान है। फिर मोंठ-बाजरा का वायना निकालकर उसपर रुपया रखकर अपनी सासजी के चरणस्पर्श कर उन्हे देने की प्रथा है। इसके बाद किसी वृद्धा को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए।

लोककथा

किसी गाँव में एक औरत रहती थी। वह बसौड़े के दिन शीतला माता की पूजा करती और ठंडी रोती खाती थी। उसके गाँव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नही करता था। एक दिन उस गाँव में आग लग गई, जिसमें उस औरत की झोपड़ी छोड़कर बाकी सबकी झोपड़ियाँ जलकर राख हो गई। जिससे सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। सब लोगों ने उस औरत से इस चमत्कार का कारण पूछा। उस औरत ने कहा कि मैं तो बसौड़े के दिन ठंडी रोती खाती हूँ, तुम लोग यह काम नही करते थे। इससे मेरी झोपड़ी बच गई तुम लोगों की जल गई। तब से बसौड़े के दिन पूरे गाँव में शीतला माता की पूजा होने लगी।

लोकगीत

मेरी माताको चिनिये चौबारो,
दूधपूत को चिनिये चौबारो।
कौन ने मैया ईंटे थपाई,
और कौन ने घोरौ है गारो।
श्रीकृष्ण ने मैया ईंटे थपाई,
दाऊजी घोरौ है गारौ।
मेरी माताको चिनिये चौबारो…।।

गीत गाते समय श्रीकृष्ण और दाऊ जी के स्थान पर अपने परिवार के सदस्यों के नाम लिए जाते हैं।

विशेष
इस वर्ष शीतलाष्टमी के दिन “वरीयान” नामक योग दुर्लभ संयोग बना रहा है। वरीयान का अर्थ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ या उत्तम होता है। इस योग में किया गया कार्य अच्छी प्रकार से सफल होता है। यह योग इष्ट एवं पूर्त्त कर्मों को करने के लिए उपयुक्त है अर्थात् इसमें लोक एवं परलोक दोनो के लिए हितकर कृत्य करना चाहिए।

ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र