सन्तान का दाता तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला ‘बहुला चौथ’ का व्रत

Fasting of 'Bahula Chauth', the giver of children and the one who increases the glory

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी बहुला चतुर्थी या बहुला चौथ कहलाती है। जो इस वर्ष सोमवार 19 अगस्त को पड़ रही है। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियाँ पुत्रों की रक्षा के लिए करती हैं। वस्तुत: यह गो- पूजा का पर्व है। सत्यवचन की मर्यादा का पर्व है। माता की भाँति अपना दूध पिलाकर गौ मनुष्य की रक्षा करती है, उसी कृतज्ञता के भाव से इस व्रत को सभी को करना चाहिये। यह व्रत सन्तान का दाता तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला है।

व्रतविधान- इस दिन गाय के दूध से बनी हुई कोई भी सामग्री नही खानी चाहिये और गाय के दूध पर उसके बछड़े का अधिकार समझना चाहिये। इस दिन दिनभर व्रत करके सन्ध्या के समय सवत्सा गौ की पूजा की जाती है। पुरवे(कुल्हड़) – पर पपड़ी आदि रखकर भोग लगाया जाता है और पूजन के बाद उसी का भोजन किया जाता है। पूजन के बाद निम्न श्लोक का पाठ किया जाता है-

या: पालयन्त्यनाथांश्च परपुत्रान् स्वपुत्रवत्।
ता धन्यास्ता: कृतार्थाश्च तास्त्रियो लोकमातर:।।

पूजन के बाद इस व्रत की कथा सुनने का विधान है।जो इस प्रकार है-
द्वापर युग में भगवान् श्रीहरि ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लेकर व्रज में अनेक लीलाएँ की तो अनेक देवता भी अपने -अपने अंशों से उनके गोप-ग्वाल रूपी परिकर बने। गो शिरोमणि कामधेनु भी अपने अंश से उत्पन्न हो बहुला नाम से नन्दबाबा की गोशाला में गाय बनकर उसकी शोभा बढ़ाने लगी। श्रीकृष्ण का उससे और उसका श्रीकृष्ण से सहज स्नेह था। बाल कृष्ण को देखते ही बहुला के स्तनों से दुग्धधारा फूट पड़ती और श्रीकृष्ण भी उसके मातृभाव को देख उसके स्तनों में कमलपँखड़ियों सदृश अपने ओठों को लगाकर अमृत सदृश पय का पान करते।
एक बार बहुला वन में हरी-हरी घास चर रही थी। श्रीकृष्ण को लीला सूझी, उन्होने माया से सिंह का रूप धारण कर लिया, भयभीत बहुला थर-थर काँपने लगी। उसने दीनवाणी में सिंह से कहा- हे वनराज! मैने अभी अपने बछड़े को दूध नही पिलाया है, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा। अत: मुझे जाने दो, मैं दूध पिलाकर तूम्हारे पास आ जाऊँगी, तब मुझे खा लेना। सिंह ने कहा – मृत्युपाश में फँसे जीव को छोड़ देनेपर उसके पुन: वापस लौटकर आने का क्या विश्वास! निरुपाय हो बहुला ने जब सत्य और धर्म की शपथ ली, तब सिंह ने उसे छोड़ दिया। बहुला ने गोशाला में जाकर प्रतीक्षारत बछड़े को दूध पिलाया और अपने सत्य धर्म की रक्षा के लिए सिंह के पास वापस लौट आयी। उसे देखकर सिंह बने श्रीकृष्ण प्रकट हो गये और बोले – बहुले! यह तेरी परीक्षा थी, तू अपने सत्य धर्म पर दृढ़ रही, अत: इसके प्रभाव से घर-घर तेरा पूजन होगा और तू गोमाता के नाम से पुकारी जायेगी। बहुला अपने घर लौट आयी और अपने वत्स के साथ आनन्द से रहने लगी।

इस व्रत का उद्देश्य यह है कि हमें सत्यप्रतिज्ञ होना चाहिये। उपर्युक्त कथा में सत्य की महिमा कही गयी है। इस व्रत का पालन करने वाले को सत्य धर्म का अवश्य पालन करना चाहिये। साथ ही अनाथ की रक्षा करने से सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह भी इस व्रत कथा की महनीय शिक्षा है।

चन्द्रोदय- रात्रि 9 बजे

ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र