जाने:-इस वर्ष लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा पर दुर्लभ संयोग

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इस वर्ष लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा पर दुर्लभ संयोग



सूर्य षष्ठी व्रत वर्ष में दो बार होता है। एक चैत्र माह में और दूसरा कार्तिक माह में। इनमें कार्तिक मास के छठ का विशेष महत्व है। छठ पर्व छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया।
बिहार एवं पूर्वांचल में सूर्य षष्ठी पर्व को सभी पर्वों में विशेष महत्व दिया गया है।ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डॉ सुभाष पाण्डेय जी ने बताया कि
इसका मुख्य कारण यह है कि बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र प्राचीन काल से कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है। सूर्य को कृषि का आधार माना जाता है, क्योंकि सूर्य ही मौसम में परिवर्तन लाता है। धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया और सूर्य षष्ठी पर्व पूरे बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश में श्रद्धापूर्वक मनाया जाने लगा और अब यह पर्व भारत की सीमा को लांघकर विदेशों में भी मनाया जाने लगा है।
सूर्य के कारण ही बादल जल बरसाने में सक्षम होता है। सूर्य अनाज को पकाता है। इसलिए सूर्य का आभार व्यक्त करने के लिए प्राचीन काल से इस क्षेत्र के लोग सूर्य पूजा करते आ रहे हैं। वेदों में भी सूर्य को सबसे प्रमुख देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है।

अग्नौ प्रस्ताSSहुति: सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज् जायते वृष्टिर् वृष्टेरन्नं तत: प्रजा।।
(मनु स्मृति ३/७६)

ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरांत आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।
अनेक वर्षों बाद छठ महापर्व पर अद्भुत संयोग बन रहा है। लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा पर इस वर्ष कार्तिक शुक्ल षष्ठी को खास संयोग भी बन रहा है। छठ का प्रारम्भ रविवार को होने और गुरु की धनु राशि मे चन्द्रमा और शनि की युति खास संयोग बना रहा है। यह खास संयोग अनेक वर्षों बाद बना है। इससे लंबे समय से बीमार चल रहे व्यक्ति का स्वास्थ्य बेहतर होगा और संतान की भी प्राप्ति होगी। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृष्‍ट‍ि की अधिष्‍ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को ‘देवसेना’ कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्‍ठी है। पुराण के अनुसार, ये देवी सभी ‘बालकों की रक्षा’ करती हैं और उन्‍हें लंबी आयु देती हैं-

”षष्‍ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्‍ठी प्रकीर्तिता |
बालकाधिष्‍ठातृदेवी विष्‍णुमाया च बालदा ||
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी |
सततं शिशुपार्श्‍वस्‍था योगेन सिद्ध‍ियोगिनी ||”
-(ब्रह्मवैवर्तपुराण,प्रकृतिखंड43/4/6)

षष्‍ठी देवी को ही स्‍थानीय भाषा में छठमैया कहा गया है। षष्‍ठी देवी को ‘ब्रह्मा की मानसपुत्री’ भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं और सभी बालकों की रक्षा करती हैं। पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्‍यायनी भी है। इनकी पूजा नवरात्र में षष्‍ठी तिथि‍ को होती है।यही कारण है कि आज भी ग्रामीण समाज में बच्‍चों के जन्‍म के छठे दिन षष्‍ठी पूजा या छठी पूजा का प्रचलन है।

इस वर्ष छठ महापर्व पर शुक्र और सूर्य के एक साथ रहने से महालक्ष्मी की भी कृपा व्रतियों पर बरसेगी।

छठ महापर्व का चार दिवसीय कार्यक्रम

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय रविवार 11 नवम्बर 2018

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

लोहंडा और खरना – सोमवार 12 नवम्बर

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

सायंकालिक अर्घ्य- मंगलवार 13 नवम्बर

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है। सायंकालीन अर्घ्य का समय :- शाम 5.15 बजे है।

प्रातः अर्घ्य- बुधवार 14 नवम्बर

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहां उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं। प्रात:कालीन अर्घ्य का समय: प्रात: 6.30 बजे है।

डाँ सुभाष पाण्डेय
प्रोफेसर ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,