जानें भाई की आयुवृद्धि और बहिन के सौभाग्य की रक्षा का पर्व ‘भैयादूज’ का शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि

Learn about the auspicious time of 'brother-in-law' and worship method for the protection of the good fortune of brother and sister

जानें भाई की आयुवृद्धि और बहिन के सौभाग्य की रक्षा का पर्व ‘भैयादूज’ का शुभ मुहूर्त एवं पूजन विधि

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यम का पूजन किया जाता है, इससे यह यम द्वितीया कहलाती है। जो इस वर्ष शुक्रवार 9 नवम्बर को पड़ रहा है।
इस दिन वणिक्-वृत्तिवाले व्यवहार दक्ष वैश्य मसिपात्रादि का पूजन करते हैं, इस कारण इसे’ कमलदानपूजा’ भी कहते हैं और इस दिन भाई अपनी बहिन के घर भोजन करते हैं, इसलिए यह ‘भइया दूज’ नाम से भी विख्यात है। हेमाद्रि मत से यह द्वितीया मध्याह्नव्यापिनी पूर्वविद्धा उत्तम होती है। स्मार्तमतमें आठ भाग के दिन के पाँचवें भाग की श्रेष्ठ मानी है और स्कन्द के कथनानुसार अपराह्नव्यापिनी अधिक अच्छी होती है। यही उचित है। व्रती को चाहिए कि प्रातः स्नानादि के अनन्तर कर्मकाल के समय अक्षतादि के अष्टदलकमल पर गणेशादि का स्थापन करके’ मम यमराज प्रीतये यमपूजनम्-व्यवसाये व्यवहारे वा सकलार्थ सिद्धये मसि पात्रादीनां पूजनम्-भ्रातुरायुष्यवृद्धये मम सौभाग्य वृद्धये च भातृपूजनं करिष्ये।’ यह संकल्प करके गणेश जी का पूजन करने के अनन्तर यम का, चित्रगुप्त का, यमदूतों का और यमुना का पूजन करें तथा
‘ धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज।
पाहि मां किंकरैः सार्धं सूर्यपुत्र नमोस्तु ते।।’
से यम की
‘यमस्वसर्ननमस्तेSस्तु यमुने लोकपूजिते।
वरदा भव मे नित्यं सूर्यपुत्री नमोSस्तु ते।।’
से यमुना की और ‘ ‘मसिभाजन संयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्।
लेखनीपट्टिका हस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्।।
से चित्रगुप्त की प्रार्थना करके शंख में या ताँबे के अर्घ्य पात्र में अथवा अंजलि मे जल पुष्प और गंधाक्षत लेकर
‘ एह्येहि मार्तण्डज पाश हस्त यमान्तकालोकधरामरेश।
भातृद्वितीयाकृतदेवपूजां गृहाणचार्घ्यं भगवन्नमोsस्तुते।।’
यमराज को अर्घ्य दें।
उसी जगह मसिपात्र(दावात) लेखनी(कलम) और राजमुद्रा(मुख्य मुहर) स्थापन करके ‘मसिपात्राय नमः’ ‘लेखन्यै नमः’ और राजमुद्रायै नमः।’ इन नाम मंत्रों से उनका पूजन करके
‘ मसि त्वं लेखनीयुक्तचित्रगुप्तशयस्थिता।
सदक्षराणां पत्रे च लेख्यं कुरु सदा मम।।’
से मसिपात्र की
‘ या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणा वरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्मात्युतशंकरप्रभृत्भिर्देवै: सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।’
से प्रार्थना करें।
इसके अतिरिक्त बहिन के घर जाकर बहिन की की हुई पूजा ग्रहण करें। बहिन को चाहिए कि वह भाई को शुभासन पर बैठाकर उसके हाथ पैर धुलाये। गन्धादि से उसका पूजन करे और दाल, भात , फुलके, कढ़ी, सीरा, पूरी, चूरमा अथवा लड्डू,जलेबी आदि यथा सामर्थ्य उत्तम पदार्थों का भोजन कराये और

भातस्तवानुजाताहं भुंक्ष्व भक्तमिमं शुभम्।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः ।।

से उनका अभिनंदन करे। इसके बाद भाई बहिन को यथा सामर्थ्य अन्न,वस्त्र, आभूषण, और सुवर्ण, मुद्रादि द्रव्य देकर उससे शुभाशिष प्राप्त करे। यदि सहजा(सगी) बहिन न हो तो पितृव्य-पुत्री(काका की कन्या) मातुल पुत्री(मामा की बेटी) या मित्र की बहिन इनमें जो हों उसके यहाँ भोजन करे। यदि यम द्वितीया को यमुना के किनारे पर बहिन के हाथ का बनाया भोजन करे तो उससे भाई की आयुवृद्धि और बहिन के अहिवात( सौभाग्य) की रक्षा होती है।

शुभ मुहूर्त

दिन 2 बजकर 12 मिनट से 4 बजकर 55 मिनट तक

ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र
ज्योतिष विभाग,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय