जीव की कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं नाग देवता

Perfecting the desires of creatures serpent god

जीव की कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं नाग देवता नागपंचमी यह व्रत श्रावण शुक्ल पंचमी को किया जाता है।ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शोध छात्र  ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र के अनुसार इस वर्ष पंचमी 15 अगस्त को प्रातः 7 बजकर 25 मिनट से लग रही है। इसमें पराविद्धा पंचमी ली जाती है। इसलिये 15 अगस्त को ही नागपंचमी मनायी जायेगी।

इस दिन सर्पों को दूध से स्नान और पूजन कर दूध पिलाने से वासुकीकुण्ड  में स्नान करने, निज गृह के द्वार में दोनों ओर गोबर के सर्प बनाकर उनका दधि, दूर्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, मोदक, और मालपुआ आदि से पूजा करने और ब्राह्मणों को भोजन कराकर एक भुक्त व्रत करने से घर में सर्पों का भय नहीं होता है। अनंत, वासुकि, शेष,  पद्मनाभ, कंबल, कर्कोटक, अश्व, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालीय, तथा तक्षक इन नागों के नाम   हल्दी और चंदन से दीवाल पर लिखें तथा नाग माता कद्रू को भी लिखकर फूल आदि से पूजा कर निम्नलिखित मंत्र से प्रार्थना करें-

अनन्तं वासकिं शेषं पद्मकम्बलमेव च।

तथा कर्कोटकं नागं नागमश्वतरं तथा।।

धृतराष्ट्रंं शंखपालं कालाख्यं तक्षकं तथा।

पिंगलञ्च महानागं प्रणमामि मुहुर्मुरिति।।

इस दिन लोहे की कड़ाही में कोई चीज ना बनावे।नैवेद्यार्थ भक्ति द्वारा गेहूं दूध का पायस बनाकर भुना चना, धान का लावा, भुना हुआ जौ, नागों को दें इस दिन लड़कों को यह चीज़ देने मात्र से दांत मजबूत हो जाते हैं। सर्प के दर्शन मात्र से मनुष्य की अधोगति होती है तमोगुणी ही सर्प होता है इसमें संशय नहीं है। पूजा कर इस तरह 12 महीनों की शुक्ल पक्ष पंचमी के रोज व्रत करें साल की समाप्ति पर शुक्ल पक्ष पंचमी के रोज फिर पूजा आदि करें नागों को भोजन के उद्देश्य से ब्राह्मणों तथा सन्यासियों को भोजन करा दें जो प्राणी धन की कृपणता का त्याग कर नाग पंचमी का व्रत तथा अर्चन करता है उस प्राणी के हितार्थ सब नागों के स्वामी शेष एवं वासुकि नाथ भगवान हरि से, सदाशिव से हाथ जोड़ प्रार्थना करते हैं शेष और वासुकि की  प्रार्थना द्वारा शिव और भगवान विष्णु प्रसन्न होकर उस जीव की कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं। यह जीव नाग लोक में अनेक तरह के भोगों को भोगने के बाद में बैकुंठ लोक या शोभायमान कैलाश में जाकर शिव या विष्णु का गण होकर परमानंद का भागी हो जाता है।

  ‘ऊँ कुरुकुल्ये हूँ फट् स्वाहा’ उपरोक्त मंत्र सर्प विष का प्रतिशोधक है। अतः विधि पूर्वक इसके जप से सर्प विष नही लगता।