सनातन धर्म एवं शैव सम्प्रदाय संकलित आलेख

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वैदिक धर्म अपने मूल रूप हिन्दू धर्म के नाम से जाना जाता है। वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लियेसनातन धर्मनाम मिलता है।सनातनका अर्थ हैशाश्वत याहमेशा बना रहने वाला‘, अर्थात् जिसका आदि है अन्त। सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जोका उच्चारणकरते थे। उनकी देखादेखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्मसिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था।

इतिहास

यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट करें।

ऋग्वेद-3-18-1

सनातन धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म कहा जाता है। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। एक दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था।

प्राचीन काल में भारतीय सनातन धर्म में गाणपत्य, शैवदेव:कोटी वैष्णव,शाक्त और सौर नाम के पाँच सम्प्रदाय होते थे।गाणपत्य गणेशकी, वैष्णव विष्णु की, शैवदेव:कोटी शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। संम्प्रदायों में एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरुओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवीदेवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, श्रुति, स्मृतियाँ,उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है।

शैव संम्प्रदाय

      भगवान शिव से जुड़े संप्रदाय को शैव संप्रदाय कहते हैं। शैव संप्रदाय के भी कई विभाजन है। एक समय था जबकि भगवान ब्रह्मा की पूजा आदि का व्यापक प्रचलन था। फिर भगवान विष्णु की पूजा आदि का व्यापक प्रचलन हुआ और फिर भगवान शिव की पूजा आदि का व्यापक प्रचलन बढ़ा। दक्षिण भारत में भगवान शिव की पूजा का खास प्रचलन है।

हिंदुओं के मुख्यत: 5 संप्रदाय माने गए हैंशैव, वैष्णव, शाक्त, वैदिक और स्मार्त। सबसे प्राचीन संप्रदाय शैव संप्रदाय को ही माना जाता है।

  शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है। 12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए। इनकी पत्नी का नाम है पार्वती जिन्हें दुर्गा भी कहा जाता है।

शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है। इनके पुत्रों का नाम है कार्तिकेय और गणेश और पुत्री का नाम है वनमाला जिन्हें ओखा भी कहा जाता था।

शिव के अवतार : शिव पुराण में शिव के भी दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है, जो इस प्रकार हैं– 1. महाकाल, 2. तारा, 3. भुवनेश, 4. षोडश, 5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक गिरिजा, 7. धूम्रवान, 8. बगलामुखी, 9. मातंग और 10. कमल नामक अवतार हैं। ये दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं।

शिव के अन्य 11 अवतार : 1.कपाली, 2. पिंगल, 3. भीम, 4. विरुपाक्ष, 4. विलोहित, 6. शास्ता, 7. अजपाद, 8. आपिर्बुध्य, 9. शम्भू, 10.चण्ड तथा 11. भव का उल्लेख मिलता है।

इन अवतारों के अलावा शिव के दुर्वासा, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भीशिव पुराणमें हुआ है जिन्हें अंशावतार माना जाता है।

शैव ग्रंथ :वेद का श्वेताश्वतरा उपनिषद (Svetashvatara Upanishad),शिव पुराण (Shiva Purana), आगम ग्रंथ  (The Agamas) और तिरुमुराई (Tiru-murai- poems) आदि प्रमुख ग्रंथ है।

शैव संस्कार :

  1. शैव संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं। वे शिवलिंग की पूजा ही करते हैं।
  2. इसके संन्यासी जटा रखते हैं।
  3. इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते।
  4. इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं।
  5. इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं।
  6. ये निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं।
  7. शैव चंद्र पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।
  8. शैव संप्रदाय में समाधि देने की परंपरा है।
  9. शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं, जहां सिर्फ शिवलिंग होता है।
  10. ये भभूति तिलक आड़ा लगाते हैं।

शैव साधुसंत

शैव साधुओं को नाथ, नागा, अघोरी, अवधूत, बाबा, ओघड़, योगी, सिद्ध आदि कहा जाता है। शैव संतों में नागा साधु और दसनामी संप्रदाय के साधुओं की ही प्रभुता है। संन्यासी संप्रदाय से जुड़े साधुओं का संसार और गृहस्थ जीवन से कोई लेनादेना नहीं होता। गृहस्थ जीवन जितना कठिन होता है उससे सौ गुना ज्यादा कठिन नागाओं का जीवन है।

शैव संतों में गुरु मत्स्येंद्र नाथ, गुरु गोरखनाथ, सांईंनाथ बाबा, गजानन महाराज, कनीफनाथ, बाबा रामदेव, तेजाजी महाराज, चौरंगीनाथ, गोगादेव, शंकराचार्य, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि हजारों संत हैं, जो जगप्रसिद्ध हैं।

शैव संप्रदाय के उप संप्रदाय : शैव में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय हैं। महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के 4 संप्रदाय बतलाए गए हैंशैव, पाशुपत, कालदमन और कापालिक।

कश्मीरी शैव संप्रदाय : कश्मीर को शैव संप्रदाय का गढ़ माना गया है। वसुगुप्त ने 9वीं शताब्दी के उतरार्ध में कश्मीरी शैव संप्रदाय का गठन किया। इससे पूर्व यहां बौद्ध और नाथ संप्रदाय के कई मठ थे।

वसुगुप्त के दो शिष्य थे कल्लट और सोमानंद। इन दोनों ने ही शैव दर्शन की नई नींव रखी। लेकिन अब इस संप्रदाय को मानने वाले कम ही मिलेंगे।

वीरशैव संप्रदाय : वीरशैव एक ऐसी परंपरा है जिसमें भक्त शिव परंपरा से बंधा हो। यह दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई है। यह वेदों पर आधारित है।

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