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नवरात्रि पूजा-विधि “ऊँ  बं बटुकाय नमः”

"ऊँ गं गणपतये नमः" से गणेश जी का पंचोपचार पूजन करे, फिर "ऊँ  बं बटुकाय नमः"

यह नवरात्र व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं। यदि स्वयं न कर सके तो पति, पत्नी, पुत्र या ब्राह्मण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है। व्रत में उपवास, अयाचित ( बिना माँगे प्राप्त भोजन), रात में भोजन करना, या एक बार भोजन करना- जो बन सके यथासामर्थ्य वह करे। यदि नवरात्रों में घट स्थापन के बाद सूतक लग जाये सूतक हो जाये तो कोई दोष नही लगता, परंतु पहले हो जाये तो पूजन आदि स्वयं नहीं करनी चाहिए।
कलश स्थापन के लिए पवित्र मिट्टी से वेदी से निर्माण करें, फिर उसमें जौ और गेँहूँ बोये तथा उसपर यथाशक्ति मिट्टी, ताँबे या सोने का कलश स्थापित करे। यदि पूर्ण विधिवत करना हो तो गणेशाम्बिका, वरुण, षोडशमातृका, सप्तघृत मातृका, नवग्रह आदि देवों का पूजन तथा पुण्याहवाचन ब्राह्मण द्वारा कराये अथवा स्वयं करे।
इसके बाद कलश पर देवी की मूर्ति स्थापित करे तथा उसका षोडशोपचार पूजन करे । तदनन्तर “श्रीदुर्गासप्तशती” का सम्पुट अथवा साधारण पाठ भी करने की विधि है। पाठ की पूर्णाहुति रे दिन दशांश हवन अथवा दशांश पाठ करना चाहिए। 
कुमारी पूजन- कुमारी पूजन नवरात्रि व्रत का अनिवार्य अंग है। कुमारिकाएँ जगज्जननी जगदम्बा का प्रत्यक्ष विग्रह है । सामर्थ्य हो तो नौ दिन तक , अन्यथा सात, पाँच, तीन, या एक कन्या को देवी मानकर पूजा करके भोजन कराना चाहिए। आसन बिछाकर गणेश,बटुक, तथा कुमारियों को एक पंक्ति में बिठाकर पहले “ऊँ गं गणपतये नमः” से गणेश जी का पंचोपचार पूजन करे, फिर “ऊँ  बं बटुकाय नमः” से बटुक का तथा” ऊँ कुमार्यै नमः” से कुमारियों का पंचोपचार पूजन करे। इसके बाद हाथ में पुष्प लेकर प्रार्थना करे। 
कहीं कहीं अष्टमी या नवमी के दिन कड़ाही -पूजा की परम्परा भी है। कड़ाही में हलवा बनाकर उसे देवी जी की प्रतिमा के सम्मुख रखा जाता है। तत्पश्चात चमचे और कड़ाही में मौली बाँधकर “ऊँ अन्नपूर्णायै नमः” इस नाम  मन्त्र से कड़ाही का पंचोपचार पूजन भी किया जाता है। तदनन्तर थोड़ा सा हलवा कड़ाही से निकालकर देवी माँ को नैवेद्य लगाया जाता है। उसके बाद कुमारी बालिकाओं को भोजन कराकर उन्हे यथाशक्ति वस्त्र आभूषण दक्षिणा आदि देने का विधान है।

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