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बड़ी जल्दी में जाते हो, कुछ अर्जेन्ट लगता है

उज्जैन। रूपांतरण दशहरा मैदान पर सम्पन्न ग़ज़लांजलि की काव्य-संगोष्ठी का प्रारम्भ राजेन्द्र शर्मा की कविता दुनिया की क्या बात करूँ, किस-किस को मैं पहचानूँ … से हुआ। डॉ. अखिलेश चौरे ने ग़ज़ल ‘रहा अरमान ज़िन्दगी में कोई हमसफ़र होता, हमारे दर्द से वाकिफ़ ग़मों से बेख़बर होता.. सुनाकर सबकी वाह-वाही पायी। सत्यनारायण सत्येन्द्र ने फागुन को और भी रंगीन बनाते हुए काव्य रचना पढ़ी ‘उत्साह उमंग उर में छाये, जब इठलाकर चला पवन… वहीं डॉ. आर.पी. तिवारी द्वारा रामभक्त हनुमानजी को सिन्दूर चढ़ाने के कारण पर छन्दमय रचना ‘एक दिवस माँ सीता ने निज, माथे सिन्दूर लगाया, मस्तक पर फिर बिन्दी सुन्दर, नभ विधु सी नवल सजाया सुनाई। वहीं प्रफुल्ल शुक्ला सरकार ने हास्य रचना पढ़ी ‘अरे ओ चाँदनी रातों में बाहर दौड़ने वालों, बड़ी जल्दी में जाते हो कुछ अर्जेन्ट लगता है… विनोद काबरा द्वारा अध्यात्म आधारित रचना ‘बहुत दिया देने वाले ने तुझको, ये पूंजी बचाए रखना सुनाई। डॉ. विजय सुखवानी ने ‘इंसान की हर ख्वाहिश तो पूरी नहीं होती, हर अर्जी की कि़स्मत में मंज़ूरी नहीं होती पढ़ी। आज की संगोष्ठी में अवधेश वर्मा, अशोक रक्ताले, आशीष अश्क एवं विजयसिंह गहलोत साकित ने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं। कार्यक्रम के अंत में पर्यावरणविद राजीव पाहवा का अभिनन्दन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. श्रीकृष्ण जोशी ने की एवं दिलीप जैन ने आभार ज्ञापित किया।

कलम से सत्य की गूंज...

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